Supreme Court : विधवा महिला की संपत्ति पर किसको मिलेगा अधिकार, मायका और ससुराल पक्ष में से ये होगा मालिक
Supreme Court : आमतौर पर प्रोपर्टी से जुड़े नियमों और कानूनों को लेकर लोगों में जानकारी का अभाव होता है। इसी कड़ी में आज हम आपको अपनी इस खबर में सुप्रीम कोर्ट की ओर से आए एक फैसले के मुताबि ये बताने जा रहे है कि आखिर विधवा महिला की संपत्ति पर मायका और ससुराल पक्ष में से किसका अधिकार होगा। कोर्ट की ओर से आए इस फैसले को विस्तार से जानने के लिए इस खबर को पूरा पढ़ लें-
HBN News TV – सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को संपत्ति विवादों पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने सभी महिलाओं, विशेषकर हिंदू महिलाओं से अपील की है कि वे अपनी संपत्ति की वसीयत (Will) अवश्य बनाएं। ताकि उनकी मृत्यु के बाद माता-पिता और ससुराल पक्ष के बीच संपत्ति को लेकर अनावश्यक विवाद न हो। पीठ ने जोर देकर कहा कि वसीयत बनाना महिलाओं के हित में है, क्योंकि कई मामलों में उनके निधन के बाद संपत्ति पर दोनों पक्षों में विवाद खड़ा हो जाता है।
सुप्रीम कोर्ट की हिंदू महिलाओं से अपील-
सुनवाई के दौरान जस्टिस बी।वी। नागरत्ना और जस्टिस आर। महादेवन की बेंच ने कहा कि सभी महिलाओं, विशेषकर उन हिंदू महिलाओं पर जो सेक्शन 15(1) के दायरे में आती हैं, उन्हें अपनी स्वयं अर्जित संपत्ति (self acquired property) को लेकर समय रहते वसीयत तैयार कर लेनी चाहिए। इससे उनकी संपत्ति का बंटवारा (division of property) उनकी इच्छा के अनुसार होगा और भविष्य में विवादों की संभावना कम रहेगी। वहीं, पीठ ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15(1)(b) को चुनौती देने वाली याचिका पर निर्णय देने से इनकार करते हुए उसकी वैधता को खुला प्रश्न माना है।
दरअसल धारा 15(1)(b) के अनुसार, यदि कोई हिंदू महिला बिना वसीयत (intestate) के मर जाती है और उसके पति, बेटे या बेटी नहीं हैं, तो उसकी संपत्ति पति के वारिसों को मिलती है। माता-पिता को केवल तब हक़ मिलता है जब पति के कोई वारिस न हों। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि किसी हिंदू महिला की मौत के बाद उसके माता-पिता या उनके वारिस उसकी संपत्ति पर दावा करते हैं और सेक्शन 15(2) लागू नहीं होता, तो पहले अनिवार्य प्री-लिटिगेशन मध्यस्थता (Pre-litigation mediation) होगी। अदालत में मुकदमा तभी दायर किया जा सकेगा। मध्यस्थता में हुआ समझौता अदालती डिक्री माना जाएगा।
मायका या ससुराल, जानें संपत्ति किसकी?
कोर्ट ने माना कि शिक्षा, रोजगार और उद्यमिता के कारण आज महिलाएं बड़ी मात्रा में स्वयं अर्जित संपत्ति की मालिक हैं। पीठ ने यह राय रखी कि ऐसे मामलों में उनके माता-पिता को किनारे कर देना विवाद और उनके लिए पीड़ा का कारण बन सकता है, हालांकि उन्होंने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की। न्यायालय (court Decision) ने इस याचिका को जनहित याचिका मानकर विचार करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने सभी संबंधित प्रश्नों को पीड़ित या प्रभावित पक्षों द्वारा दायर उपयुक्त मामले में निर्णय के लिए खुला छोड़ दिया।
मृत हिंदू महिला की मां की ओर से दायर एक स्थानांतरण याचिका ।transfer petition में मौजूद वकील कसुमीर सोढ़ी ने भी दलीलें पेश कीं, दरअसल महिला की मृत्यु (death of women) बिना किसी संतान या पति के हुई थी। उन्होंने दलील दी कि श्री गोवर्धन की याचिका के आधार पर मामले को गुण-दोष के आधार पर बंद नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि यह पूरी तरह से सुने जाने के अधिकार के आधार पर तय किया जा रहा है।
संपत्ति अधिकारों पर कोर्ट ने क्या कहा?
उनकी दलीलों पर, अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए तर्कों के गुण-दोष के आधार पर कोई निर्णय नहीं दिया जा रहा है, क्योंकि इस पर उचित मामले में विचार किया जाएगा। अदालत (court) ने स्पष्ट किया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15 की संवैधानिकता या असंवैधानिकता (unconstitutionality) पर कोई निर्णय नहीं दिया है।
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट
24 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधानों (Hindu Succession Act) पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने हिंदू विवाह और महिला संपत्ति अधिकारों पर चर्चा करते हुए कहा कि हिंदू समाज हजारों वर्षों से नियंत्रित है और कोर्ट नहीं चाहती कि कोई फैसला इस व्यवस्था को तोड़े।
उन्होंने ‘कन्यादान’ और ‘गोत्र दान’ जैसे शब्दों को याद रखने पर जोर दिया। कोर्ट ने कहा कि शादी के बाद महिला का गोत्र और उपनाम (सरनेम) बदल जाता है, जो इस परंपरा का हिस्सा है।
मायके और ससुराल के बीच संपत्ति विवाद को मध्यस्थता के लिए भेजा-
जब कोई महिला विवाहित होती है, तो उसके भरण-पोषण की जिम्मेदारी उसके पति और ससुराल पक्ष पर ही होती है। ऐसे में विवाहित महिला अपने भाई के खिलाफ भरण-पोषण की याचिका दायर नहीं कर सकती।
खासकर दक्षिण भारत में विवाह के दौरान यह औपचारिक घोषणा (formal announcement) की जाती है कि वह एक गोत्र से दूसरे गोत्र में प्रवेश कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (Hindu Succession Act) के इस प्रावधान की वैधानिकता को चुनौती देने पर एतराज जताया और मायके तथा ससुराल पक्ष (in-laws side) के बीच संपत्ति विवाद को मध्यस्थता के लिए भेज दिया था।
दरअसल सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाओं में नि: संतान हिंदू विधवा महिला (Childless Hindu widow woman) की अगर बिना वसीयत मौत हो जाए तो उसकी संपत्ति पति के परिवार को दिए जाने प्रावधान को चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधानों को चुनौती दी गई है, जिसमें कहा गया है कि पति के निधन के बाद बिना संतान वाली हिंदू महिला उसकी संपत्ति पति के परिवार को जाएगी। अगर पति के परिवार में कोई नहीं है तो ही संपत्ति उसके मायके वालों को जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट (supreme court) में जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 [धारा 15 (1) [बी] के खिलाफ जनहित याचिका की सुनवाई की, जो पारिवारिक संपत्ति (household wealth) के निपटान से संबंधित है। कोर्ट ने कहा कि संभव है कि उसके पति, बेटा या बेटी जीवित नहीं हो, उसकी बेटी के बच्चे हो सकते हैं। वे सभी प्राथमिक श्रेणी के कानूनी उत्तराधिकारी (primary category legal heirs) होंगे।
महिला की मृत्यु बिना वसीयत किए हो जाए तो क्या होगा?
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि वर्तमान व्यवस्था में महिला की अधिकांश संपत्ति पति के परिवार को ही जाती है। यदि अदालत धारा 15(1)(b) को मनमाना मानते हुए इसे उसकी गरिमा को प्रभावित करती है, तो फिर यह भी सवाल उठता है कि एक महिला की गरिमा का क्या होगा जब उसे जीवनभर अपने पति की संपत्ति (husband property) पर ही निर्भर रहना पड़े।
वकील ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून की इस धारा के तहत यदि कोई महिला बिना वसीयत बनाए (woman without making a will) ही मृत्यु को प्राप्त होती है और उसकी प्रथम श्रेणी में कोई उत्तराधिकारी नहीं है, तो उसकी संपत्ति दूसरी श्रेणी के उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित हो जाती है।
वकील ने कहा कि ये एक तरह की जनहित याचिका ही है, क्योंकि ऐसे अनेक मामले मिल जाएंगे। ऐसे ही एक मामले में पति की बहन अपने निसंतान भाई-भाभी की मृत्यु के बाद उनकी संपत्ति (property) पर दावा कर रही है। कोर्ट ने कहा कि एक विकल्प था कि वह शादी करके कहीं और जा सकती थी।
वहीं एक याचिका में विवाद ये है कि कोविड (covid) के दौरान एक कामकाजी युवा दंपति कि बिना किसी वसीयत के मौत के बाद उनकी माताओं के बीच संपत्ति का विवाद (property dispute) हैं। मृत लड़के की मां का दावा है कि मृत दंपति की पूरी संपत्ति (entire estate of the deceased couple) पर उसका अधिकार है जबकि मृत युवती की मां चाहती है कि उसकी बेटी का संचित धन और संपदा उसे मिल जाए।
First published on: November 20, 2025 04:06 PM